Sunday, 20 April 2008
आई पी एल
धूम मस्ती दीवानगी आदि आदि का मिश्रण है आई पी एल । ललित मोदी का दिमाग और सुभाष चन्द्रा द्वारा दी गई परोक्ष चुनौती ने बीसीसीआई को भी मुकाबले के लिए विवश किया। पैसे की चमक ने तमाम विदेशी खिलारिओं को आई पी एल में खेलने के लिए बाध्य किया चाहे इसके लिए उन्हें अपने देश के लिए बगावत भी क्योंना करना पड़े । पैसा जो न करे । भाई आज golblisation का दौड़ में आप किसी को बाँध कर नहीं रख सकते। कुछ बुढे पर गए खिलाड़ी जैसे मियांदाद टाइप लोग जिनको भारत की क्रिक्केतिया तरक्की फूटी आँख नहीं सुहा रही । मान लिया की आज कल भारत पाकिस्तान को पीट रहा है तो इसमें अपना क्या दोष है । २० २० की हार अभी तक नहीं भूले तो मत भूलो लेकिन उदई भारत से जलो मत और भी white टाइप लोगों। कुछ तो सोचो की आज का भारत जवान है और जवानों को रोकना ...... मतलब सोचलो। यदि भारत आई सी सी को हांकता है तो इसमे क्या गलती है । कहतें हैं की जल में रहकर मगर से बैर । सारा पैसा का अस्सी प्रतिशत विश्वा क्रिकेट को भारत से तो क्यों ना चले मेरा............
Friday, 7 March 2008
राय दे
मैं भड़ास के लेखकों से अनुरोध करता हूँ की वे अपना ध्यान उन नेताओं के करनी कथनी पर भी जरुर लगाएं जो जनता के नजर में अपने को बहुत बड़ा तारनहार के रूप में पेश करते हैं । पिछ्लें दिनों मैनें एक लेख भड़ास पर डाला था जिसमें नरेगा की कुछ खामिओं और हकीकत के बारे में बताया था । मैं चाहता हूँ की आप उन नेताओं का जरुर पर्दाफास करें जो इस रोजगार देने वाले कानून को सीढी बनाकर चुनावी बेरा को को पर लगना चाहते हैं। इक तो मजदूरों को अनिश्चित काम और उसको संचालित करने वाले कर्मिओं को ठेका की नौकरी । क्या यह चल सकता है। चाहे बिहार सरकार हो या केन्द्र सरकार इस जिम्मेदारी से नहीं बच सकती की सौ दिन के काम से ही एक परिवार को गुजरा हो सकता है क्या ठेके के कर्मी इस योजना को क्योंकर सफल बानाने की कोसिस करें । अपेक्षित टिप्पणी ।
आपकी राय
मैं भड़ास के लेखकों से अनुरोध करता हूँ की वे अपना ध्यान उन नेताओं के करनी कथनी पर भी जरुर लगाएं जो जनता के नजर में अपने को बहुत बड़ा तारनहार के रूप में पेश करते हैं । पिछ्लें दिनों मैनें एक लेख भड़ास पर डाला था जिसमें नरेगा की कुछ खामिओं और हकीकत के बारे में बताया था । मैं चाहता हूँ की आप उन नेताओं का जरुर पर्दाफास करें जो इस रोजगार देने वाले कानून को सीढी बनाकर चुनावी बेरा को को पर लगना चाहते हैं। इक तो मजदूरों को अनिश्चित काम और उसको संचालित करने वाले कर्मिओं को ठेका की नौकरी । क्या यह चल सकता है। चाहे बिहार सरकार हो या केन्द्र सरकार इस जिम्मेदारी से नहीं बच सकती की सौ दिन के काम से ही एक परिवार को गुजरा हो सकता है क्या ठेके के कर्मी इस योजना को क्योंकर सफल बानाने की कोसिस करें । अपेक्षित टिप्पणी ।
Thursday, 14 February 2008
मराथागिरी
बहुत हो गया राज भाई । आज शिवाजी होते तो सबसे पहले तुम्हें ही अपनी गुरेल्ला युद्ध का शिकार बानाते क्योंकि तुमने उस राष्ट्रवाद को मारना प्रारम्भ किया है जिसके लिए उन्होंने मुगलों के खिलाफ जान तक को दाव पर लगा दिया था । यदी तुम्हें मराठा मानुस की इतनी ही फिकर है तो क्यों नहीं विदर्भ के किसानों के लिए कुछ करते हो जो मरकर भी अपना कर्ज चुका नहीं पाते । जिस बिहारी कामगारों को तुम अपनी सस्ती लोकप्रियता के लिए बेरोजगार मराठी युवकों को अपनी सेना बनाकर पिटवा रहे हो उन सेनाओं को उन्हीं बिहारी लोगों से यह क्यों नहीं कहते सिखने को जो अपनी मेहनत की कमाई खाते हैं और इस देश के लिए connecting india का रियल रोल अदा करतें हैं। मुम्बई किसी की जागीर नहीं । पूरे देश की जान है। अच्छा होगा यदि सारे दल इस राज टाइप गुंडा गर्दी से और उसके चाचा सीनियर ठाकरे के मुह्फत बयानों पर लगाम लगाने के सार्थक कोशिश करें। सबसे सस्ती जान बिहारी लोगों की ही नहीं है जिसको जब जहाँ मन हुआ वहीं धो दिए।
Sunday, 6 January 2008
क्रिकेट
आज भले ही भारत हर गया हो लेकिन इस हर में आस्ट्रेलिया के ग्यारह खिलारी के अलावे दो एम्पायर भी साथ थे। बकनर को तो भारत के खिलाफ मैच में जैसे नशा ही चढ़ जाता है कि जो भी निर्णय देना है वह इंडिया के खिलाफ दूंगा । सचिन आउट नहीं है तो क्या मैं हूँ ना । बकौल बकनर । अरे कुछ भी कर लो भारतीय गेंदबाज बकनर आपके पक्ष में फैसला देने वाला नहीं। आस्ट्रेलिया को मैच जीतने पर जो पैसा मिलता है उसका बारहवां हिस्सा बकनर का भी बनता है। आस्ट्रेलिया को हराना है तो आपको बकनर जैसों से बचना होगा। क्या होता यदि सिमंड्स आउट होता पहली पारी में और आस्ट्रेलिया २०० के अन्दर पहली पारी में सिमट जाता और भारत को ३०० से अधिक रन की बढ़त मिलती । फिर दूसरी पारी को मिलाकर भी आस्ट्रेलिया नहीं जीतता । आज भारत टेस्ट मैच जीत जाता क्योंकि इसे लगभग १०० रन बनाना होता। खैर आगे जरुर इन्साफ होगा।
Wednesday, 24 October 2007
बिजली की आँख मिचौली
उर्जा मंत्री बिहार , के गगनभेदी आश्वाशन की, बेगुसराय में छात्रों के लिए शाम छः से दस बजे रात्री तक हर हाल में बिजली दी जायेगी किन्तु यह आश्वाशन दपोर्शंखी साबित हुआ।यह कैसी विडंबना है की जहाँ बिजली उत्पादन होता है उस जिले को बिजली का रोना रोना परता है । भले ही बेगुसराय के लोग तमाम आधुनिक सुविधाओं को जुटाने की क्षमता रखते हों , किन्तु उनका यह शौक बिन बिजली सब सुन रहता है। हमारे संसद जो सिर्फ वोट के यार हैं , काहे को ध्यान देंगे की काम से कम आधे दिन की भी बिजली बेगुसराय को मिले। शहर में बहुत सायबर कैफे हैं किन्तु सब बिजली का ही रोना रोते हैं । यहाँ की जनता को अब इंतजार छोर क्रांति की राह चुनना होगा क्योंकि इसके बिना कम नहीं होने वाला । ऐसा करना गलत भी नहीं होगा क्योंकि सारा आश्वासन फेल हो चुका है।
Sunday, 14 October 2007
अवसरवादी राजनीती
भारतीय राजनीती में सौदेबाजी का नजारा किसी शब्जी विक्रेता और ग्राहक के बीच के मोल भाव से कम नहीं होता। जब संप्रग की सरकार बन रही थी तो उस समय वामपंथियों के बाहरी समर्थन ने इसे बहुमत दिलवाया था जबकि कांग्रेस और वामपंथी केरल बंगाल और त्रिपुरा में सीधे एक दुसरे के खिलाफ थे और जब सरकार बनाने की बारी आई तो दोनो गले मिल गए जैसे कि सुबह के बिछुरे शाम को घर पर एक साथ आए हो । कुछ दिनों तक वाम और कांग्रेस एक ही गले से दो आवाज बोल रहे थे किन्तु धीरे धीरे कांग्रेस का अपना एजेंडा खुलता चला गया, वाम के सुर भी बदलने लगे। नटवर सिंह की जिस तरह विदाई हुई क्योंकि अमेरिका विरोधी मानसिकता के कारन वामपंथी इन्हें अपने अनुकूल मानते थे और वाम धारा समर्थक मणिशंकर अय्यर से पेट्रोलियम मंत्रालय लिया जाना कांग्रेस द्वारा वामपंथियों को परोक्ष चुनौती थी कि मेरा अपना एजेंडा है जो आपके दवाब पर नहीं चलेगा। फिर भारत अमेरिका परमाणु समझौता जब अपनी सफ़लता की राह पर अग्रसर रहा तो अब वामपंथियों ने इसे सीधे अपने विचारधारा और नीति पर चोट माना और समर्थन वापसी कीं बात की बयार चला दीं।
ये सब तो हुआ नाटक का दर्शक पहलू किन्तु जिस मुद्दे को उठाकर कांग्रेस सत्ता में आयी और वामपंथियों ने अपने राज्य में जनता से अपार समर्थन पाकर लोकसभा सदस्य जीते , क्या उस मुद्दे का समाधान हुआ ? नहीं , क्योंकि जिस कहानी का मंचन किया जाना था वह गुम हो गया। भारत गेहूँ निर्यातक से आयातक बन गया वह भी अपने किसानो को दिए जाने वाले मुल्य से दोगुने पर। बेरोजगारी दूर करने के उपायों के बदले सिर्फ हवाई घोषणा की गई और पिछरों को अच्छी शिक्षा उपलब्ध कराने के बदले आरक्षण का कार्ड खेलकर जातिवाद की हवा को और टूल दिया गया। बेचारे मुस्लमान तो सिर्फ समिती और आयोग के चक्कर में ही रह गए। पीछले तीन वर्षों में मंहगाई तीन गुनी बढ़ी किन्तु मुद्रास्फीति को चार प्रतिशत से कम दिखाया जाता है अखिर आम जनता को एस इस सरकार प्रायोजित मुद्रा स्फीति से क्या मतलब । उसे तो आता चावल का भाव उसकी कमाई के अस्तित्व की जानकारी दे देते हैं। आन्तरिक उग्रवाद तो अब अपनी सीमा लाँघ चूका है । देश का २०० जिला नक्सल पीड़ित है। किसानो की आत्महत्या रोकने के उपाय के वादों के साथ यह सरकार सत्ता में आई किन्तु किसान मृत्यु दर बढती ही जा रही। कहने को तो प्रधानमंत्री के अधीन उसका मंत्री होता है किन्तु अपने मंत्रियों पर प्रधानमंत्री की थोरी सी भी चल पाती है? ये सारे मुद्दे हैं जिसका जवाब जनता मांगेगी। नेता बदलने से आम जनता की मांग नहीं बदल जाती। परमाणु मुद्दे पर प्रधानमंत्री का ताजा बयान देश को गुमराह करने वाला है । कल तक परमाणु समझौता पर सरकार की बलि तक देने वाले आज यह बोल रहे की अब इस समझौते के ऐवज में सरकार नहीं जायेगी । शायद कांग्रेस गुजरात और हिमाचल के चुनाव परिणाम तक रूक कर अपनी स्थिती को देखना चाहे । यदी अभी चुनाव हो जाये तो सत्ता पक्ष की हालत क्या होगी?
ये सब तो हुआ नाटक का दर्शक पहलू किन्तु जिस मुद्दे को उठाकर कांग्रेस सत्ता में आयी और वामपंथियों ने अपने राज्य में जनता से अपार समर्थन पाकर लोकसभा सदस्य जीते , क्या उस मुद्दे का समाधान हुआ ? नहीं , क्योंकि जिस कहानी का मंचन किया जाना था वह गुम हो गया। भारत गेहूँ निर्यातक से आयातक बन गया वह भी अपने किसानो को दिए जाने वाले मुल्य से दोगुने पर। बेरोजगारी दूर करने के उपायों के बदले सिर्फ हवाई घोषणा की गई और पिछरों को अच्छी शिक्षा उपलब्ध कराने के बदले आरक्षण का कार्ड खेलकर जातिवाद की हवा को और टूल दिया गया। बेचारे मुस्लमान तो सिर्फ समिती और आयोग के चक्कर में ही रह गए। पीछले तीन वर्षों में मंहगाई तीन गुनी बढ़ी किन्तु मुद्रास्फीति को चार प्रतिशत से कम दिखाया जाता है अखिर आम जनता को एस इस सरकार प्रायोजित मुद्रा स्फीति से क्या मतलब । उसे तो आता चावल का भाव उसकी कमाई के अस्तित्व की जानकारी दे देते हैं। आन्तरिक उग्रवाद तो अब अपनी सीमा लाँघ चूका है । देश का २०० जिला नक्सल पीड़ित है। किसानो की आत्महत्या रोकने के उपाय के वादों के साथ यह सरकार सत्ता में आई किन्तु किसान मृत्यु दर बढती ही जा रही। कहने को तो प्रधानमंत्री के अधीन उसका मंत्री होता है किन्तु अपने मंत्रियों पर प्रधानमंत्री की थोरी सी भी चल पाती है? ये सारे मुद्दे हैं जिसका जवाब जनता मांगेगी। नेता बदलने से आम जनता की मांग नहीं बदल जाती। परमाणु मुद्दे पर प्रधानमंत्री का ताजा बयान देश को गुमराह करने वाला है । कल तक परमाणु समझौता पर सरकार की बलि तक देने वाले आज यह बोल रहे की अब इस समझौते के ऐवज में सरकार नहीं जायेगी । शायद कांग्रेस गुजरात और हिमाचल के चुनाव परिणाम तक रूक कर अपनी स्थिती को देखना चाहे । यदी अभी चुनाव हो जाये तो सत्ता पक्ष की हालत क्या होगी?
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